Wednesday, August 31, 2011

AP STATE EXAMS: ONGC GRADUATE TRAINEE-2010 GENERAL AWARENESS

AP STATE EXAMS: ONGC GRADUATE TRAINEE-2010 GENERAL AWARENESS: 1.Women20-20 world Championship was Won By (A)Australia (B)England (C)Pakistan (D) India 2. Who is the Chairperson of Identification ...

gk papers,: Timeline: India

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Sunday, August 28, 2011

gk papers,: GK-->The First Indian

gk papers,: GK-->The First Indian: Actress of the Talkies Zubeida, Alam Ara(1931) . Actress to win Padma Shri Award Nargis Dutt(1958) . Architect Maha Govinda(5th C.BC)...

Saturday, August 27, 2011

GENERAL KNOWLEDGE WORLD: Geography Question 1 - 100

GENERAL KNOWLEDGE WORLD: Geography Question 1 - 100: 1. Which one of the following districts is the leading producer of Maize ? A. Chittorgarh B. Bhilwara C. Raj Samand D. Udaipur Answer...

GENERAL KNOWLEDGE WORLD: Geography Questions 101-200

GENERAL KNOWLEDGE WORLD: Geography Questions 101-200: 101. Farakka Barrage has been constructed A. To increase the flow of water in river Hoogley B. To generate hydro-electric power Answer ...

GENERAL KNOWLEDGE WORLD: Geography Questions 201-300

GENERAL KNOWLEDGE WORLD: Geography Questions 201-300: 201. Bhilai Steel works has been built with the foreign collaboration of the— A. British B. Russians C. Germans D. Americans Answer :...

GENERAL KNOWLEDGE WORLD: Geography Questions 101-200

GENERAL KNOWLEDGE WORLD: Geography Questions 101-200: 101. Farakka Barrage has been constructed A. To increase the flow of water in river Hoogley B. To generate hydro-electric power Answer ...

Friday, August 26, 2011

TRAIN WALI LADKI....................A HEART TOUCHING LOVE STORY

बाहर शहर भर का उजाला था और भीतर नाईट बल्ब के अँधेरे में सुलगते दो इंसान । पारा अपने सामान्य स्वभाव से लुढ़क गया था । ब्लैंडर स्प्राइड के दो पटियालवी पैग गले का रास्ता नाप चुके थे और तीसरे को अभी कोई जल्दी नहीं थी । सिगरेट के धुएँ के मध्य कोई अनकही बात दबी थी । जिसे अभी बाहर आना था । और उसने अपने आने की दस्तक तीसरे पैग के सँवरने के दौरान दे दी थी ।

-"क्यों कर रहा है, ये सब ?" संजय गिलास आगे बढाते हुए बोला ।
-क्या ?
-"तू जानता है । मैं क्या और किस बारे में कह रहा हूँ ?" संजय ने खीजते हुए कहा ।

आदित्य ने गिलास थामा और कुछ नहीं बोला । संजय ने अगली सिगरेट सुलगा ली और लम्बा कश लेते हुए एक घूँट भरा । फिर हड़बड़ाहट में उठा और कमरे की एक दीवार से दूसरी दीवार तक जाकर, वापस लौट कर बैठते हुए बोला "तुझे हो क्या गया हा ? जहाँ सारी दुनिया अवसर पाते ही यू.एस. और यू.के. भागती है और तू किस्मत को धोखा देना चाहता है । इस अच्छी भली एम.एन.सी. की नौकरी को छोड़ कर, तू उस सरकारी नौकरी में जाने का फैसला कैसे कर सकता है ? और वो भी उस छोटे से पहाड़ी शहर में, जहाँ से दुनिया ठीक से दिखाई भी नहीं देती । और तुझे क्या लगता है कि तेरे ऐसा करने से दुनिया पीछे छूट जायेगी या तू खुद को उससे अलग कर लेगा ।"

-"मैं एकांत चाहता हूँ । इन सबसे दूर । इस भीड़ से, इस शोर से, इस भागती दौड़ती जिंदगी से ।" आदित्य ने लम्बी चुप्पी को तोड़ते हुए कहा ।
-और तू सोचता है कि तुझे एकांत प्राप्त होगा । तू किसको भ्रमित कर रहा है । किस्मत को, मुझे या अपने आपको । किन्तु माफ़ करना मेरे दोस्त । तू तब तक स्वतंत्र नहीं हो सकता, जब तक कि उस अतीत को पीछे नहीं धकेलता । जिसके साथ तू प्रत्येक क्षण जीता है ।
-ऐसी कोई बात नहीं है, संजय ।
-"उस बात को तीन बरस होने को आये और तू है कि" संजय अपना गिलास खाली करते हुए बोला । फिर अगला पैग बनाने लगा । भूल जा उसे और नए सिरे से जिंदगी शुरू कर । वो भी कहीं अपने पति और बच्चों के साथ ख़ुशी-ख़ुशी जी रही होगी ।

आदित्य ने सिगरेट के कशों के मध्य स्वंय को खामोश कर लिया । उसने यही आदत बना ली थी । संजय उसे हर दफा समझाता था और वह चुप्पी साध लेता था । ख़ामोशी, कुछ भी कहने से बचने का सबसे अच्छा औज़ार होती है । एक छोर से दूजे छोर तक पसरी हुई । अपने पूर्ण विस्तार के साथ स्वंय के होने का एहसास कराती सी । अदृश्य किन्तु स्पर्श की हुई ।

अंततः छह पैग ख़त्म कर लेने के बाद संजय पुनः उसी विषय पर लौट आया । असल में संजय का यही स्वाभाव था । जब तक वह अपनी बात पूरी नहीं कह लेता था, पीता रहता था । और आज तो एक तरह से अंतिम दिन ही था । कल आदित्य को चले जाना था । वह अपनी ओर से, किसी भी तरीके से, उसे रोक लेना चाहता था । वह जानता था कि उसका यूँ एकाएक दूर चले जाना, सही नहीं है । कोई इंसान स्वंय से कब तक भाग सकता है ।

-"तू कहे तो तेरा रेजिगनेशन कैंसिल करवा दूँ । वो एच.आर. मेरी परिचित है और अभी भी उसने वह रेजिगनेशन लैटर आगे नहीं बढाया है ।" संजय ने लगभग होश में आते हुए कहा ।
-"नहीं, उसकी आवश्यकता नहीं है । मैंने निश्चय कर लिया है कि मैं अब यहाँ नहीं रहूँगा ।" आदित्य ने प्रत्युतर में कहा ।
-क्या निश्चय कर लिया है ? अपने को धीमे-धीमे समाप्त कर लेने का ।
-"गुड नाईट" कहता हुआ आदित्य उठ खड़ा हुआ और अपने कमरे में जाने लगा ।
-"ठीक है करो, जो करना है ।" संजय खीजते हुए बोला ।

घड़ी दो के टनटनाने की आवाज़ कर रही थी और संजय नींद के आगोश में जा चुका था । किन्तु आदित्य करवटें बदलते हुए उठ खड़ा हुआ । और सिगरेट जलाकर बरामदे में आराम कुर्सी पर बैठ गया । एकाएक धुएँ के उस ओर चेहरा झलकता है । फिर शोर करती ट्रेन प्लेट फॉर्म से छूटती प्रतीत होती है । और एक ही पल में वह अपने अतीत में चला जाता है ।

वो अक्टूबर की कोई रात थी । आदित्य को हैदराबाद से दिल्ली की दस तीस की ट्रेन पकडनी थी । घडी की सुइयाँ अपनी आदत से तेज़ दौड़ती प्रतीत हो रही थीं । बीते दिनों में कंपनी ने जिस प्रोजेक्ट के सिलसिले में उसे हैदराबाद भेजा था, वह पूर्ण हो चुका था । और आज वह वापस दिल्ली को जा रहा था । वह जल्दबाजी में ऑटो रिक्शे से निकल स्टेशन की और दौड़ा । ट्रेन ने अलविदा की सीटी दे दी थी । आदित्य ने एक नंबर प्लेटफॉर्म से छूटती उस ट्रेन को दौड़ते हुए पकड़ा ।

उसने अपने उस इकलौते बैग को जंजीर में जकड़ते हुए सीट के नीचे खिसका दिया । और ऊपरी जेब से टिकट निकाल कर, अपनी होने वाली सीट का मुआयना करने लगा । तभी उसकी नज़र सामने की सीट पर, अपने सामान को दुरुस्त करती लड़की पर गयी । एक तेईस-चौबीस बरस की खूबसूरत लड़की का उसके सामने की सीट पर होना संयोग की बात थी । जबकि बाकी की चार सीटें रिक्त हों ।

अगला एक घंटा अपनी-अपनी सीट को अपनाने और बोगी के शांत होने में व्यतीत हो गया । धीमे-धीमे सभी यात्री अपने-अपने हिस्से की लाईट बुझाने लगे । यात्रियों को ट्रेन, नींद आने का सबसे सुखद स्थान प्रतीत हो रही थी । मानो वे सब इसमें यात्रा के लिए नहीं बल्कि सोने आये हों ।

तभी उस खूबसूरत सहयात्री ने कहा "यदि आपको कष्ट ना हो तो मैं ये लाईट बुझा दूँ, सोने का समय हो चला है ।" आदित्य ने ऊपरी सीट से झाँकते हुए देखा और एकटक देखता ही रहा । उसकी खूबसूरत बड़ी-बड़ी आँखें थीं, जो उसके चेहरे को दुनिया के बाकी खूबसूरत चेहरों से अलग करती थीं । उसने चादर ओढ़ते हुए फिर से अपनी बात दोहराई । आदित्य का ध्यान भंग हुआ और तब उसने कहा "जी बिल्कुल, मुझे कोई आपत्ति नहीं है" । लाईट बुझ गयी । जिसका अर्थ था कि सो लेने के सिवा कोई बेहतर विकल्प हाथ में नहीं है । और अंततः कुछ क्षण सोचते हुए आदित्य भी नींद की गोद में चला गया ।

सुबह के आठ बज गए थे, जब आदित्य की आँख खुली । उजाले में ट्रेन शोर मचाती हुई चली जा रही थी । याद हो आया कि वह ट्रेन में है और दिल्ली को वापस जा रहा है । उसने नीचे को झाँक कर देखा । वो अपनी सीट पर बैठी किताब पढने में मग्न थी । खिड़की के रास्ते से आती मुलायम धूप, रह-रह कर लुका-छुपी का खेल, खेल रही थी । मालूम होता था, सुबह का सूरज उसके चेहरे की आभा से लजा रहा हो ।

आदित्य सीट पर से उतरकर, चप्पलों को संभालते हुए, नित्य कर्म करने की ओर चल दिया । वापसी में चेहरे को धुलकर, स्वंय के जागने की निशानी ओढ़ आया । और आकर नीचे की ही रिक्त सीट पर बैठ गया । उसने बाहर की ओर झाँका । खिड़की के उस ओर से पेड़, खेत और उनमें काम करते लोग पीछे की ओर दौड़ते से जान पड़ रहे थे ।


बीते क्षणों में वह कभी बाहर की दुनिया को देखता तो कभी सामने बैठी उस खूबसूरत सहयात्री को । जो अब भी उतनी ही दिलचस्पी के साथ किताब पढ़ रही थी । जिस के बाहरी आवरण पर अनूठी चित्रकला का प्रदर्शन करते हुए, कुछ आकृतियाँ नज़र आ रही थीं । प्रथम दृष्टि में वह हिंदी की किताब जान पड़ती थी । तभी चाय वाले की आवाज़ सुनाई दी "चाय, चाय, चाय" । उसके पास में आते ही, आदित्य ने कहा "दोस्त एक चाय देना" । कप को हाथ में थामते हुए आदित्य ने पर्स निकाला तो याद हो आया कि सभी छुट्टे तो खर्च हो चुके थे और अब उसके पास केवल पाँच सौ के नोट हैं । वह मुस्कुराते हुए नोट को चाय वाले को थमाता है ।
-"क्या साहब सुबह-सुबह मैं ही मजाक के लिए मिला हूँ" चाय वाला प्रतिक्रिया देता है ।
-दोस्त छुट्टे तो नहीं हैं मेरे पास ।
-देख लो साहब होंगे या किसी से करा लीजिए ।
-"अब इस वक़्त कहाँ से करा लूँ ? मैडम आपके पास होंगे पाँच सौ के छुट्टे ?" सामने बैठी लड़की से पूँछते हुए आदित्य ने कहा ।
-"नहीं मेरे पास तो नहीं हैं" उसने किताब से नज़रें उठाते हुए कहा ।
-"ठीक है दोस्त तो फिर तुम अपनी यह चाय वापस रखो" आदित्य ने कप आगे बढाते हुए कहा ।
-"अरे आप चाय पी लीजिए । मैं पैसे दिए देती हूँ । आप बाद में मुझे दे देना ।" लड़की ने आदित्य को देखते हुए कहा ।
-"जी शुक्रिया" कहते हुए आदित्य ने कप को अपने पास रख लिया ।

लड़की पुनः अपनी किताब में व्यस्त हो चली । घडी नागपुर के आने का वक़्त बता रही थी । हालाँकि लगता नहीं था कि नागपुर अभी कुछ ही मिनटों में आ पहुँचेगा । और आते ही संतरे की सुगंध फैला देगा । जहाँ दौड़ते हुए लोग खाने-पीने की वस्तुएँ खरीदेंगे । और ट्रेन कुछ देर सुस्ता लेगी ।

-"शुक्रिया, आपके कारण चाय पी रहा हूँ " आदित्य ने चाय की चुस्की भरते हुए कहा ।
-लड़की प्रत्युतर में हौले से मुस्कुरा दी और पुनः पढने लगी ।
-"आप हिंदी की किताबों को पढने का शौक रखती हैं" आदित्य ने प्रश्न पूँछने के लहजे में कहा ।
-"जी, क्यों ? हिंदी में कोई बुराई नज़र आती है आपको" लड़की ने प्रत्युतर में कहा ।
-नहीं, बुराई तो नहीं किन्तु आज के समय में जब सभी अंग्रेजी की ओर भाग रहे हैं । और उसे पढना और बोलना अपनी समृद्धि समझते हैं । आप अरसे बाद मिली हैं जो हिंदी का कोई उपन्यास पढ़ते हुए दिखी हैं ।
-"जी, कम से कम मैं तो ऐसा नहीं सोचती । मुझे हिंदी से अथाह प्रेम है । हिंदी में कहानियाँ, कवितायें पढना मुझे अच्छा लगता है । हाँ लेकिन इसका अर्थ ये भी नहीं है कि मैं अंग्रेजी में कुछ नहीं पढ़ती । उसमें भी मुझे दिलचस्पी है ।" लड़की ने अपना पक्ष रखते हुए कहा ।
-"क्या कहा ? अथाह प्रेम । अरे वाह आप तो शुद्ध हिंदी का प्रयोग करती हैं ।" आदित्य ने उसकी इस बात पर कहा ।
-"बस पढ़कर ही सीखा है" लड़की मुस्कुराते हुए बोली ।
-"वाह, आप तो बहुत बड़ी हिंदी प्रेमी निकलीं" आदित्य मुस्कुराते हुए बोला ।
- आप सिर्फ बातें बनाना जानते हैं या कुछ और भी करते हैं ?
-आदित्य उसकी इस बात पर पुनः मुस्कुरा दिया और बोला "बस यही समझ लीजिए"
-क्यों आप कोई नेता हैं जो केवल बातें बनाना जानते हैं ।
-आदित्य उसकी इस बात पर खिलखिला कर हँस दिया और कप को खिड़की के रास्ते बाहर फैंकते हुए बोला "वैसे जिसे आप पढ़ रही हैं । वह काम मैं भी कर सकता हूँ ।"
-क्या, पढ़ सकते हैं ?
-नहीं, लिख सकता हूँ ।
-अच्छा, तो आप लेखक हैं ?
-नहीं, लेखक तो नहीं किन्तु कभी-कभी लिख लेता हूँ ।
-अच्छा, सच में ? फिर तो बड़े काम के आदमी निकले आप । क्या लिखते हैं आप ?
-कुछ खास नहीं, बस शब्दों को आपस में प्रेम करना सिखाता हूँ ।
-मतलब ?
-"मतलब कि कभी-कभी कवितायें लिख लेता हूँ " आदित्य ने उत्तर दिया ।
-"अरे वाह, कैसी कवितायें लिखते हैं आप ? " लड़की गहरी दिलचस्पी लेते हुए बोली ।
-कोई ख़ास विषय नहीं, बस यूँ, जब मन में जो आया बस वही लिख देता हूँ ।
-"अच्छा, तो फिर सुनाइये न, अपना लिखा कुछ" लड़की खुश होते हुए बोली ।
-अच्छा ठीक हैं सुनाता हूँ किन्तु आपको एक वादा करना होगा कि आप बदले में मुझे चाय पिलायेंगी । अभी तक मेरे पास छुट्टे नहीं आये हैं ।
-इस बात पर वह मुस्कुरा गयी और बोली "जी बिल्कुल, पक्का"

आदित्य उसे अपनी एक कविता सुनाता है । वह प्रशंसा करते हुए पुनः एक और कविता सुनाने का आग्रह करती है । आदित्य अपनी दो-तीन कवितायें और सुनाता है ।

-सचमुच आप बहुत अच्छी कवितायें लिखते हैं । मन प्रसन्न हो गया सुनकर ।
-अच्छा, सच में । तो अब केवल प्रशंसा से काम नहीं चलेगा । अपना वादा पूरा कीजिए और मुझे चाय पिलाइए ।
-जी, बिल्कुल ।

अगले कुछ क्षणों में चाय वाला टहलता हुआ वहाँ आ पहुँचा और दोनों ने चाय पी । इस बीच में किताब औंधे पड़े हुए सुस्ता रही थी । यूँ कि उसे अच्छा अवसर मिल गया हो अपनी थकान दूर करने का । ट्रेन की गति धीमी हो चली थी, जो एहसास करा रही थी कि नागपुर बस आ पहुँचा । कुछ यात्री अपने शहर पहुँचने की ख़ुशी मना रहे थे और सामान को बटोर कर, अपने कन्धों पर लाद, दरवाजे को घेरे खड़े थे । आदित्य भी स्टेशन पर उतर, छुट्टे कराने के उद्देश्य से उनके पीछे खड़ा हो गया । ट्रेन प्लेटफोर्म के सहारे रेंगने लगी और अंततः दम तोडती सी, बेजान हो गयी ।

उतरकर वह कई शक्लों से होता हुआ पहले एक दुकान पर पहुँचा, फिर दूसरी, तीसरी और इस तरह से उसने कुछ फल, नमकीन, पानी की बोतल और बिस्कुट के पैकेट खरीद लिए । वापसी में ठेले पर से ताज़ी गर्म पूडियां और सब्जी को थामे हुए वह ट्रेन में चढ़ गया ।

-"लीजए अपना उधार ।" बैठते हुए आदित्य बोला ।
-"जी नहीं । अब आपकी बारी है, चाय पिलाने की ।" लड़की मुस्कुराते हुए बोली .
-ये भी ठीक है । फिलहाल ये गरमा गर्म पूड़ियाँ खाइए ।
-"ये आपने बहुत अच्छा किया । सुबह-सुबह नाश्ता हो जायेगा ।"अपना हिस्सा सँभालते हुए लड़की ने कहा ।

खाने के बीच में ट्रेन चल दी थी । और चाय वाले के आ जाने पर, आदित्य ने अपना आधा उधार चुकता कर दिया था । बाकी के सहयात्री पेट भर जाने पर चहकने की मुद्रा में आ गए थे । मानों अब ट्रेन के सफ़र का आनंद दोगुना हो चला हो । कुछ बच्चे एक दरवाजे से, दूसरे दरवाजे की ओर दौड़ लगा रहे थे । लम्बी यात्रा करने वालों को ट्रेन ने अपना लिया था ।


-"तो आप करते क्या हैं ?" लड़की ने आदित्य से पूँछा ।
-"जी कुछ खास नहीं । एक सॉफ्टवेयर कंपनी में इंजीनियर हूँ ।" आदित्य ने खिड़की के बाहर से ध्यान भीतर लाते हुए कहा ।
-तो आप सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं ?
-जी
-कहाँ ?
-दिल्ली में काम करता हूँ और प्रोजेक्ट के सिलसिले में हैदराबाद गया था ।
-"एक बात, जो मैं आपसे कम से कम अवश्य पूँछना चाहूँगा" आदित्य पूरी तरह वहाँ आते हुए बोला ।
-क्या ?
-यही कि आपका नाम क्या है ?
-वो इस बात पर मुस्कुरा गयी और बोली "निशा चौहान और मैं पंजाब नेशनल बैंक में असिस्टेंट मैनेजर हूँ । काम के सिलसिले में हैदराबाद गयी थी और अभी भोपाल में ही कार्यरत हूँ ।"
-अरे वाह । इसका मतलब में एक बैंक मैनेजर के सामने बैठा हूँ ।
-वो हँस दी और बोली "बातें बनाना तो कोई आप से सीखे । अरे हाँ आपका नाम क्या है ? मैं तो पूँछना ही भूल गयी ।"
-आदित्य
-एक पल के लिए लगा उसने नाम दोहराया हो....आदित्य

बाद के भोपाल तक के सफ़र में दोनों के मध्य ढेर सारी बातें हुईं । जिनमें एक दूसरे की पसंद, फिल्मों, कहानियों, लेखकों और परिवार के सदस्यों से जान-पहचान जैसे विषय शामिल थे । और उसी दौरान आदित्य ने निशा के लिए कविता लिखी थी । जिसने उसे इतना प्रभावित किया कि उसने आदित्य से उसकी डायरी में कैद चन्द कविताओं की माँग कर ली । जिसे आदित्य ने ख़ुशी-ख़ुशी दूसरे पन्नों पर उतार कर दे दिया ।

-"और हाँ, आपका ऑटोग्राफ और पता भी" कविताओं को लेते हुए निशा ने कहा ।
-वो भला क्यों ?
-अरे, इतना हक़ तो बनता है आपकी प्रशंसिका का ।
-प्रत्युतर में मुस्कुराते हुए, आदित्य ने कविताओं के अंत में पुनः अपनी कलम चला दी । जिसकी स्याही में आदित्य का पता भी शामिल था ।

सुखद समय जल्दी ही व्यतीत हो चला था और कुछ ही समय दूर, भोपाल स्टेशन प्रतीक्षा में था । ट्रेन सुस्त हो चली थी । मालूम होता था कि भोपाल आ पहुँचा । निशा ने अपना सूटकेस बाहर की ओर निकाला और हाथ आगे बढाते हुए बोली....अच्छा चलती हूँ....आदित्य उठ खड़ा हुआ...रुकिए मैं आपको बाहर तक छोड़ देता हूँ । आदित्य ने उसका सूटकेस बाहर निकाला और दरवाजे के साथ ही खड़ा हो गया । निशा के चेहरे पर मुस्कान बिखर गयी....देखो तो वक़्त का पता ही नहीं चला....प्रत्युतर में आदित्य भी मुस्कुरा दिया । फिर निशा ने हाथ आगे बढाया....अच्छा तो अब चलती हूँ । आदित्य ने हाथ मिलाते हुए कहा "अपना ख्याल रखना" ।

निशा सूटकेस को थामे सीढ़ियों पर चढ़ती हुई नज़र आ रही थी । ट्रेन ने छूटने का इशारा दे दिया था । आदित्य पुनः अपनी सीट पर आ बैठा । और कुछ ही समय में भोपाल स्टेशन बहुत पीछे छूटता नज़र आने लगा । जहाँ कहीं निशा रहती होगी ।

कुछ पल तक आभास होता रहा कि निशा अभी यहीं है । उसके पीछे छूट गयी, उसकी महक अब भी हवा में तैर रही थी । आदित्य ने उस एहसास को भुलाते हुए आँखें मूँद लीं और सोने की कोशिश में लग गया । बचा हुआ दिल्ली तक का सफ़र उसने सोकर बिताया । और सुबह होते ही अपने पुराने शहर में पहुँच गया । वैसे भी बीते हुए दिनों में दिल्ली उसे बहुत याद आ रहा था ।

ट्रेन के सफ़र को तीन महीने बीत चुके थे । और स्मृतियों में केवल निशा का नाम शेष रह गया था । बसंत अपने आने की दस्तक देने लगा था । धूप अब भी गुनगनी लगती थी । दिल्ली पुनः रंगीन हो चली थी । मालूम होता था कि अब तक कोहरे में छिपी हुई थी । आने वाले हफ्ते में पुस्तक मेला लगने जा रहा था । आदित्य के लिए यह एक ख़ुशी का सबब था कि अबकी बार सप्ताहांत किसी अच्छी जगह बिताने को मिलेगा । और वह बेसब्री से अंतिम दो दिनों की प्रतीक्षा करने लगा ।

साहित्यिक खजाने के मध्य में आकर आदित्य मंत्रमुग्ध था । उसने आधा बैग अपनी पसंदीदा किताबों से भर लिया था और उसकी इच्छा बढती ही जा रही थी । कई किताबों को टटोलता हुआ, वह अंतिम छोर पर जा पहुँचा । उस दुबके हिस्से में कई बेशकीमती किताबें मौजूद थीं । जिनमें आदित्य खो सा गया था । तभी एकाएक पीछे से आवाज़ आई "अरे आदित्य, आप" । उसने पलटकर देखा, निशा सामने खड़ी थी । एक पल को उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि वे दोनों आमने-सामने खड़े हैं ।

-"आप यहाँ कैसे ?" आदित्य ने मुस्कुराते हुए पूँछा ।
-"बस, जैसे आप, वैसे मैं" निशा प्रत्युतर में बोली ।
-मतलब ?
-अरे बाबा, किताबें खरीदने आई हूँ । मेरी बुआ जी दिल्ली में ही रहती हैं । उन्ही के यहाँ छुट्टी लेकर आई थी ।
-आपने बताया नहीं कि आपकी बुआ जी यहाँ रहती हैं ।
-आपने पूँछा भी तो नहीं ।

फिर दोनों एक-दूसरे की बातों पर खिलखिलाकर हँस दिए । अगले ही कुछ क्षणों में दोनों मैदान में बैठे कॉफी पी रहे थे । दोनों अपने-अपने हिस्से की ख़ुशी छुपा नहीं पा रहे थे । जो रह-रह कर उनकी बातों के साथ बही जा रही थी ।

-"अच्छा, हाँ, मैं तो बताना ही भूल गयी । मैं कल ही आपको यह चैक भेजने वाली थी ।" अपने पर्स की तलाशी लेते हुए निशा ने कहा ।
-किस बात का चैक ?
-"आपकी कविता को मैंने अपने बैंक में होने वाली वार्षिक प्रतियोगिता में दिया था । और आपकी कविता को प्रथम पुरस्कार मिला है । ये रहा आपका पाँच हज़ार का चैक ।" आदित्य को पकड़ाते हुए निशा ने कहा ।
-ये मेरे नाम से कैसे ?
-अरे ये मेरी चैक बुक से कटा हुआ है । बैंक की ओर से मिला चैक मेरे नाम का था ।
-"अब ये मैं नहीं रख सकता । जीती आप हैं । आप ही जानें ।" आदित्य ने चैक वापस करते हुए कहा ।
-कविता तो आपकी ही थी । तो यह आपका ही हुआ न ।
-अच्छा ठीक है । न मेरा और न आपका । इसकी रकम को किसी अनाथालय में जमा करा देते हैं ।
-हाँ ये बेहतर है । और मेरी ट्रीट ?
-"वो तो आपको वैसे भी मिल जायेगी ।" आदित्य ने मुस्कुराते हुए कहा ।

अगले रोज़ आदित्य, निशा को साथ ले अनाथालय गया । कुछ घंटे वहाँ बिताने के बाद और दान की रस्म अदायगी करते हुए, वे लौट पड़े । वापसी में दिल में सुकून की हलचल हो रही थी । मालूम होता था कि एक सुखद एहसास उनके साथ चला आया है ।

-लम्बी चुप्पी को तोड़ते हुए, आदित्य ने निशा से पूँछा "किस रेस्टोरेंट में चलना है ।"
- "रेस्टोरेंट कोई भी हो, बस खाना लज़ीज होना चाहिए ।" निशा मुस्कुराते हुए बोली ।
-जी, हुज़ूर ।

अगले ही क्षणों में, वे एक रेस्टोरेंट में थे । आदित्य जाते ही कुर्सी पर बैठ गया । निशा खड़े हुए मुस्कुराने लगी । "ओह, माफ़ करना" कहता हुआ आदित्य उठा और निशा के लिए हौले से कुर्सी को पीछे धकेल कर, बैठने के लिए आमंत्रित किया । निशा मुस्कुराते हुए बैठ गयी ।

कितनी तो अनगिनत बातें थीं । जो दोनों ने अपने पास जमा कर रखी थी । बातों के मध्य नए-नए विषय जन्म ले लेते थे । और इनके मध्य में किसी बात पर निशा का मासूमियत से हँस देना । अपने बालों को रह-रह कर कानों के पीछे धकेलते रहना । खाने के मध्य में चोरी से आदित्य को देखना । और कहना कि चुप क्यों हो । उस रोज़ तो बहुत बोल रहे थे । प्रत्युतर में आदित्य का मुस्कुरा जाना शामिल था ।

बुआ के घर जाने से पहले, निशा ने आदित्य को बताया कि वह कल भोपाल चली जायेगी । आज ही उसकी छुट्टियां ख़त्म हो रही हैं और कल के बाद से उसे ऑफिस जाना है । निशा विदा लेते हुए, आदित्य से उसका मोबाइल नंबर ले जाना नहीं भूली । जो उनकी दोस्ती के दिनों के लिए आवश्यक हो गया था ।

भोपाल पहुँचने पर निशा ने फ़ोन किया । जो फिर एक आदत में तब्दील हो गया । कभी आदित्य फ़ोन करता तो कभी निशा । मिनटों का स्थान पहले घंटों ने लिया और फिर कई दफा तो सारी रात बीत जाती । बातें थीं कि, एक ख़त्म होती तो दूजी उपज आती । अब दोनों को ही इस बात का एहसास हो चला था कि उनका रिश्ता अब केवल दोस्ती तक सीमित नहीं रहा । वे उसकी परिधि के बाहर जा चुके हैं । किन्तु यह केवल एक अनकहा सच था । जिसे किसी ने कबूल नहीं किया था । यह केवल मौन स्वीकृति थी कि वे किसी भी विषय को छू सकते थे । अपना रूठना जता सकते थे । रात-रात भर, एक दूसरे को मना सकते थे । उन दिनों में निशा आदित्य को 'आदि' कहने लगी थी और आदित्य निशा को आप से तुम ।

दो महीने बाद, निशा का दिल्ली आना हुआ । जो संयोगवश ना होकर, पूर्व नियोजित था । वे दोनों जब मिले तो उनके मध्य चुप्पी पसर गयी । कहने को कितना कुछ तो था । किन्तु वह क्या था जो रोके हुए था । आने से पहले दोनों ने क्या-क्या तो सोचा था । कि ये कहेंगे या वो कहेंगे । किन्तु मौन टूटे नहीं टूट रहा था । अंततः आदित्य बोला "तो अबके तुम्हारी बारी है, ट्रीट देने की" । निशा के गालों पर गड्ढे उभर आये, जो अक्सर ही उसके खुश होने को जताते थे ।

-"हाँ, हाँ, क्यों नहीं । कहाँ चलना है ? वहीँ, उसी रेस्टोरेंट में ?" निशा चहकते हुए बोली ।
-नहीं, वो तो जब चाहे खा सकते हैं ।
-तो फिर क्या खाना है, ज़नाब को ?
-एक अर्सा हो गया । मैगी नहीं खायी । सूजी का हलवा नहीं खाया । घर का खाना नहीं खाया ।
-अरे तो ये सब भी खिला सकते हैं आपको । हमारी बुआ के घर चलो ।
-अच्छा, सच में ।
-हाँ, बिल्कुल । यदि आप की दिली ख्वाहिश यही सब खाने की है तो ।
-क्यों ? तुम्हारी बुआ को ऐतराज़ नहीं होगा कि किसको ले आई घर पर ।
-जी नहीं, हमारे दोस्तों का हमेशा स्वागत है, उनके घर पर ।
-अच्छा, यदि ऐसा है तो चलते हैं ।

घर पर जाकर मालूम चला कि बुआ जी और फूफा जी कहीं बाहर जा रहे हैं । और ये जानने पर कि आदित्य ख़ास तौर पर आमंत्रित हुआ है । उन्होंने निशा को जाते-जाते समझा दिया कि बिना कुछ खाए, आदित्य को जाने न दिया जाए । अब केवल वे दोनों घर में थे । और आदित्य की दिली ख्वाहिश को पूरा करने के लिए निशा ने मैगी, सूजी का हलवा और कॉफी बनायीं ।

-"शादी क्यों नहीं कर लेते ? रोज़ ही घर का खाना खाया करना" मैगी और हलवा ख़त्म हो जाने और कॉफी के घूँट के मध्य निशा ने कहा ।
-बहुत देर की ख़ामोशी के बाद आदित्य ने कहा "किससे ?"
-कोई तो होगी ऐसी । जिससे शादी कर सकते होगे ।
-"मुझे तो कहीं नज़र नहीं आती" आदित्य ने गलत उत्तर देते हुए कहा ।

निशा अपनी जगह से उठकर, खाली हुए दोनों कप लेकर रसोई में जाने लगी । कप उठाते हुए ही उसकी आँख में आँसू भर आये थे । जिन्हें उसने रसोई में जाकर बहाया । पीछे से आदित्य ने जाकर उसे गले से लगा लिया । "अरे तुम तो रोने लगीं । मैं तो मजाक कर रहा था । अच्छा बाबा, आई लव यू" निशा के आँसुओं को उंगली पर लेते हुए आदित्य बोला । निशा के गालों पर गड्ढे उभर आये । और वो पुनः आदित्य के गले से लग गयी । एहसास होता है कि ना जाने कितने समय से वे यूँ ही एक दूजे से चिपके हुए हैं ।

अबके निशा जो भोपाल गयी तो पीछे छोड़ गयी, भविष्य के सपने और मीठी यादें । दोनों ने आने वाले समय में शादी करने का निर्णय लिया था । भविष्य से बेखबर, वे वर्तमान में खुश थे । इस दृढ विश्वास के साथ कि निशा अपने पिताजी को अंतर्जातीय विवाह के लिए मना लेगी । दोनों अपनी पूरी जिंदगी, एक दूजे के साथ बिताने का हिसाब कर चुके थे ।

उनके प्यार को लगभग एक साल बीतने को हो आया था । और इस बीच वे कई बार एक-दूसरे से मिल चुके थे । मौका पाते ही निशा दिल्ली चली आती या सप्ताहांत में आदित्य भोपाल चला जाता । दिन बड़े सुकून भरे थे । एहसास होता था कि अभी तो शुरू हुए हैं । अभी तो एक-दूजे का हाथ थामा है । अभी तो सपने बुनने शुरू किये हैं ।

सुखद समय का बहुत जल्द ही अंत हो गया । जब निशा ने आदित्य के बारे में, अपने पिताजी को बताया । उन्होंने साफ़ कर दिया था कि यह शादी किसी भी हालत में नहीं हो सकती । निशा भी कहाँ हार मानने वाली थी । उसने अपना स्थानांतरण दिल्ली करा लिया । और घर पर साफ़ लफ़्ज़ों में कह दिया कि चाहे जो हो जाए वह आदित्य से ही शादी करेगी । वह धीमे-धीमे अपने घर से विच्छेदित सी हो गयी थी । तभी उसकी माँ ने उसे एक बार घर आने को कहा । और वह माँ के लिए भोपाल चली गयी ।

उस रात निशा के पिताजी ने किसी लड़के का फोटो दिखा कर, जबरन शादी करने का दबाव बनाया । निशा ने इसकी कल्पना भी नहीं की थी कि उसके परिवार के सदस्य ऐसा करेंगे । उसने सुबह होते ही दिल्ली जाने के, अपने इरादे के बारे में बता दिया । उसके पिताजी ने कुछ नहीं कहा । और वह अपने पीछे रोती, बिलखती माँ को छोड़ कर चली आई ।

दो रोज़ बाद भोपाल से माँ का फ़ोन आया कि पिताजी अस्पताल में भर्ती हैं । उन्होंने आत्महत्या करने की कोशिश की है । खबर पाते ही निशा ने आदित्य को सब बताया और भोपाल को रवाना हो गयी । अस्पताल में पिताजी बेबस, लाचार प्रतीत होते थे । लगता था कि दान में उसके हिस्से की खुशियाँ माँगना चाहते हों ।

अगले दो रोज़ बाद अस्पताल से घर पहुँचने की रात को वे निशा के कमरे में आये और अपना सर उसके क़दमों पर रख दिया । एक ही क्षण में उन्होंने निशा की सारी खुशियाँ माँग लीं । अब निशा द्वन्द में फँसी थी । एक ओर वो जिसने उसे पाला, पढाया, लिखाया और काबिल बनाया । दूसरी ओर आदित्य, जिसके साथ वह जीवन भर खुश रहेगी । फिर अगले ही क्षण ख़याल हो आया कि, क्या वह जीवन भर अपने पिताजी की मौत का कारण बनकर जी सकेगी ? क्या वह खुश रह सकेगी ? और उसने पिताजी से वादा किया कि जैसा वो चाहते हैं, वैसा ही होगा ।

वह अंतिम बार के लिए दिल्ली जाना चाहती थी । और आदित्य को अपनी मजबूरी बता देना चाहती थी । उसने घर पर ऑफिस के काम का कह, कुछ दिन दिल्ली हो आने का निर्णय लिया । और भोपाल से चली आई ।

बीते दिनों में आदित्य और निशा के मध्य कई मुलाकातें हुई, लम्बी-लम्बी बातें हुईं किन्तु हासिल कुछ न हुआ । और अंततः निशा ने आदित्य को नयी जिंदगी शुरू करने के लिए कहा । यह कोई निर्णय नहीं था अपितु एक बेबसी थी । एक जान को बचा लेने की लाचारी । जिसके आगे उस क्षण, सब छोटा मालूम होता था । हारकर आदित्य ने निशा के रास्ते से हट जाना बेहतर समझा । जो आगे कहाँ जाएगा, उसका निशा को भी पता नहीं था ।

उस आखिरी के रोज़ ट्रेन प्लेटफॉर्म से छूटने को थी और आदित्य ने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए, अंतिम अलविदा कहना चाहा । उस क्षण, उसका दिल यही दुआ कर रहा था कि यह ट्रेन छूट जाए । दिल्ली का भोपाल से हर सम्बन्ध विच्छेदित हो जाए । कोई ट्रेन, कोई वाहन वहाँ को न जाता हो । बस दिल्ली अपने आप में एक दुनिया हो । जिसमें वो और निशा ख़ुशी-ख़ुशी रह सकें । किन्तु यह एक भ्रम था और कुछ नहीं । दिल्ली दुनिया का एक बहुत छोटा हिस्सा थी और वह एक मामूली आदमी ।

ट्रेन चली गयी और वह प्लेटफॉर्म की बैंच पर बैठा था । निपट अकेला, शून्य में निहारता हुआ ।

तभी आने वाली गाडी की घोषणा सुनाई पड़ती है । उसे होश आता है । जैसे नींद में से जागा हो । और वह स्वंय को, तीन बरस के बाद, इस फ़्लैट के बरामदे में, आराम कुर्सी पर पाता है । जहाँ पास के ही कमरे में संजय अर्धमूर्छित सा लेटा है । नाईट बल्ब अभी भी उसी तरह जल रहा है । सिगरेट राख में तब्दील हो चुकी है । वह उठता है और बल्ब को बुझाने से पहले, घड़ी की ओर देखता है । वह सुबह के पाँच बजाने को थी । याद हो आता है कि सुबह सात की ट्रेन पकडनी है । वह तौलिया लेकर बाथरूम में चला जाता है । और बाहर आकर अपना बैग और सूटकेस सँभालने लगता है । एकाएक उसे संजय का ख्याल हो आता है । वह एक कागज़ पर अपना नया पता लिखकर, उसके सिरहाने की डायरी में रख देता है । और फिर सामान उठाकर बाहर चल देता है । अपने पीछे एक जाने पहचाने शहर को छोड़कर, एक अंजान कस्बे की ओर ।

नया क़स्बा:

आसमान में तारे टिमटिमा रहे हैं । चाँद पूरा खिला हुआ है । तीखी हवा को चीरती हुए, ट्रेन एक छोटे से स्टेशन पर आ रुकी है । आदित्य अपना बैग और सूटकेस बाहर निकालता है । साथ में एक परिवार और भी उतरा है । कोई उनके लिए वहाँ पहले से मौजूद है । वे गले मिलते हुए, कुछ ही क्षणों में आँखों से ओझल हो गए हैं । सफ़ेद कमीज पर काले सूट को पहने हुए साहब से वह कुछ पूँछता है । वह हाथ का इशारा करते हुए स्टेशन की कमी को गिनाता है । काले लिबाज़ को पीछे छोड़ते हुए, आदित्य आगे की ओर बढ़ जाता है । वहाँ एक-दूसरे से चिपकी हुई बैंच, सर्दी से बचने का जतन कर रही हैं । कोई शौल ओढ़े हुए बैठा है । आदित्य वहाँ पहुँच कर, उसके पीछे की बैंच पर बैठ जाता है । पैंट की तलाशी लेते हुए सिगरेट की डिब्बी निकालता है और माचिस की तीली को जलाकर, बुझा देता है । धुआँ आस-पास तैरने लगता है । जो अपनी सरहद को पार करते हुए, पीछे खेलने लगता है । पीछे से खाँसने की आवाज़ आती है । वह उठ खड़ा होता है और टहलने लगता है । तेज़ हवा का झोंका आया और शौल उसके पास जा गिरी । वह शौल उठाकर बैंच के पास पहुँचा है । और वह क्षण फ्रीज़ हो जाता है । दोनों इतने बरस बाद एक-दूसरे के सामने थे । आदित्य को उस क्षण विश्वास ही नहीं होता कि वह निशा को देख रहा है ।

-"निशा, तुम ?" आदित्य अपनी जड़ता समाप्त करते हुए बोलता है ।
-निशा प्रत्युतर में शौल ओढ़ते हुए मुस्कुराती है ।
-यहाँ कैसे ?
-यहाँ के नवोदय विद्यालय में पढ़ाती हूँ ।
-"अच्छा, तो बैंक की नौकरी कब छोड़ दी ?" आदित्य उसी बैंच पर बैठते हुए सवाल करता है .
-"अब तो बहुत दिन हो गए । पिछले एक बरस से पढ़ा रही हूँ ।" निशा बीते हुए समय से वर्तमान में आते हुए कहती है ।
-"अच्छा" आदित्य निशा के चेहरे को देखते हुए कहता है ।
-और आप ?
-मैंने भी सरकारी नौकरी पकड़ ली है । आज ही ज्वाइन करनी है ।

निशा अगले क्षण खामोश हो जाती है । बीते हुए समय का कोई प्रश्न नहीं करती । आदित्य पुनः सिगरेट जला लेता है और उठकर टहलने लगता है । और जाकर प्लेटफॉर्म की नोक पर खड़ा हो जाता है । फिर से तेज़ नुकीली हवा का झोंका आता है । आदित्य भीतर तक कपकपा जाता है "हूँ-हूँ-हूँ, बहुत ठण्ड है" । निशा अपने बैग से नया शौल निकाल कर देती है "इसे ओढ़ लीजिए, नहीं तो ठण्ड लग जायेगी" । आदित्य शौल ओढ़ कर फिर से बैंच पर बैठ जाता है । और इधर-उधर नज़रें दौडाने लगता है "चाय वाला कहीं दिखाई नहीं देता" । निशा अपने बैग से, थर्मस निकाल कर, कप में चाय उढेल कर देती है "मैंने पहले ही चाय वाले से थर्मस भरवा लिया था, जब वह दुकान बंद करके जा रहा था" । आदित्य कप को पकड़ते हुए, अपने बैग में कुछ तलाशने लगता है ।

-क्या हुआ ?
-अरे कुछ खाने के लिए देख रहा था ।
-"रुको मेरे पास कुछ नमकीन और बिस्कुट रखे हैं ।" निशा अपने बैग को खोलते हुए बोली ।
-"अरे मेरे पास भी गुजिया हैं, जो घर से लौटते समय माँ ने रखी थीं ।" आदित्य बैग से डब्बा निकालते हुए बोलता है ।
-अच्छा ।
-"हाँ लो, तुम भी खाओ" आदित्य को याद था कि निशा को माँ के हाथ की गुजिया बहुत पसंद है ।
-"माँ कैसी है ? बड़ी किस्मत वाली होगी आपकी बीवी, जो इतना प्यार लुटाने वाली माँ मिली है" निशा गुजिया लेते हुए बोली ।
-जैसी पहले थी । लेकिन किस्मत ने माँ का साथ नहीं दिया ।
-क्या मतलब ?
-"प्यार लुटाने के लिए उनकी बहू का होना भी बहुत जरुरी है ।" चाय ख़त्म करते हुए आदित्य बोला ।
-"आदि...." कहते हुए निशा के चेहरे पर ढेर सारे प्रश्न उभर आये ।
-खैर मेरा छोडो । तुम बताओ । तुम्हारे पति ने कैसे आ जाने दिया, इस छोटे सी जगह ।

प्रत्युतर में निशा भरी आँखों के साथ खामोश हो गयी । जिस अतीत से बचने की कोशिश में वह यहाँ आई थी । आज वह प्रश्न बनकर सामने आ खड़ा हुआ । आदित्य ने अगले क्षण सिगरेट का धुआँ छोड़ते हुए कहा "उत्तर नहीं दिया" । निशा ख़ामोशी से नमकीन और बिस्कुट की पैकेट बैग में रखने लगी । आदित्य को यह ख़ामोशी चुभने लगी और उससे रहा नहीं गया । और उसकी गीली आँखों में झांकते हुए बोला "क्या हुआ ? तुम मेरी बात का उत्तर क्यों नहीं देती" । आँसू आँखों से उतरकर गालों पर लुढ़क आये ।

-निशा ने बस इतना कहा "अब वो नहीं हैं" ।
-क्या हुआ ?
-एक रोड एक्सीडेंट और सब ख़त्म ।
-कब ?
-"शादी के छह महीने बाद ।" कहते हुए निशा अपनी आँखों को रुमाल से ढक लेती है ।

सिगरेट सुलगकर आदित्य का हाथ जला देती है और खुद को छुड़ा कर, फर्श पर लेट जाती है । आज बरसों बाद आदित्य की आँख भर आयी क्योंकि वो दुखी थी । आस-पास चुप्पी पसर गयी । जान पड़ता था कि बस साँसों के चलने की आवाज़ आ रही हो । ये ख़ामोशी उसे आखिरी की मुलाकात पर पहुँचा देती है । तब भी उसके पास कहने को कुछ शेष नहीं था और आज भी उसे कुछ सूझ नहीं रहा था ।

-"तो क्या पढ़ाती हो बच्चों को ?" आदित्य विषय बदलने के उद्देश्य से कहता है ।
-अंग्रेजी
-तो बच्चों को अंग्रेज बनाया जा रहा है ।
-प्रत्युतर में निशा के गालों पर गड्ढे उभर आते हैं ।

फिर कुछ क्षण के लिए सन्नाटा पसर जाता है । दोनों ही अपने हिस्से की ख़ामोशी ओढ़ लेते हैं ।

"शादी क्यों नहीं कर लेते ? कब तक यूँ ही भटकते रहोगे ? और फिर माँ को भी तो अपनी बहू चाहिए । उनसे उनका हक क्यों छीनते हो " निशा चुप्पी तोडती है । आदित्य सिगरेट जलाता हुआ उठ खड़ा होता है । एक कश लेता है, धुआँ छोड़ता है और कहता है "जानती हो निशा, बचपन में माँ ने एक पक्षी की कहानी सुनाई थी । जो बारिश की पहली बूँद की प्रतीक्षा करता है और यदि वह छूट गयी तो वह बाकी की बूँदों के बारे में सोचता भी नहीं । और वैसे भी किसी ने कहा है, हर किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता ।" और इसके साथ ही अगला कश और फिर धुआँ उड़ने लगता है ।

-"वैसे चाँद मियाँ अब भी ड्यूटी पर हैं । देखो, अभी तक रौशन हैं ।" आदित्य चाँद की और देख कर कहता है ।
-"शायद आज पूरे चाँद की रात है ।" निशा स्वंय को ठीक से ढकते हुए कहती है ।
-तुम्हें चाँदनी रात बहुत पसंद थी न ।
-तब जानती नहीं थी कि अमावस्या भी आती है । और कभी-कभी बहुत लम्बी, स्याह काली ।

यह बात आदित्य के भीतर एक तीखी कसक छोड़ जाती है । वह स्वंय को संभालते हुए, प्लेटफॉर्म के किनारे पहुँच शौल हटाकर चुभती हवा को स्पर्श करता है । और कपकपाते हुए घडी देखता है । "अभी दो घंटे में सुबह हो जायेगी । कितना दूर है तुम्हारा हॉस्टल ?" पूँछता हुआ बैंच पर आ बैठता है । "यही कोई चार-पाँच किलोमीटर दूर" कहती हुई निशा पुनः खामोश हो जाती है ।

दोनों के मध्य लम्बी चुप्पी के बाद कब आँखें सो जाती हैं, एहसास ही नहीं होता । एकाएक आदित्य की आँखें खुलती हैं । वह घडी की ओर देखता है । "अरे छह बज गए । चलो उठो चलते हैं अब ।" आदित्य, निशा को जगाते हुए कहता है । दोनों स्टेशन के बाहर निकल आते हैं । सामने ही बस दिखाई देती है । निशा बस में चढ़ने को होती है, तभी आदित्य ताँगे की ओर इशारा करके कहता है "चलो उसमें चलते हैं" । दोनों ताँगे वाले के पास पहुँचते हैं । वह बताता है कि पहले स्कूल पड़ेगा, उसके बाद सरकारी दफ्तर । आदित्य सामान को रखकर, निशा की चढ़ने में मदद करता है । जब तीनों उस पर सवार हो जाते हैं तो ताँगा धीमे-धीमे आगे बढ़ने लगता है ।

वह एक छोटा किन्तु बहुत ही खूबसूरत पहाड़ी क़स्बा था । रास्ते के दोनों ओर ऊँचे वृक्ष थे और उनको बच्चा जताते हुए, सीना चौड़ा करके खड़े हुए पहाड़ । घोडा अपनी लय में दौड़ा जा रहा था । सड़क पर से उसके क़दमों के थपथपाने का संगीत सुनाई दे रहा था । तभी आगे-पीछे हिलती हुई निशा को देखकर, आदित्य ताँगे वाले से बोला "अरे भाई जान, इसमें एफ.एम है क्या ?" इस बात पर निशा के होठों पर मुस्कान खिल जाती है । "क्या साहब, आप मजाक बहुत करते हैं ।" ताँगेवाले ने घोड़े की पीठ को थपथपाते हुए कहा ।

-अच्छा तो तुम ही कोई गाना सुना दो ।
-साहब हमें तो गाना नहीं आता ।
-अच्छा, ये तो बहुत गलत बात है ।
-"कितने बच्चे हैं तुम्हारे ?" मुस्कुराती निशा की ओर देख लेने के बाद आदित्य ने पूँछा
-एक लड़की है ।
-बस एक ही, हम तो सोच रहे थे कि चार-पाँच तो होंगे ही ।
-अरे साहब ऐसी गलती तो हम कभी नहीं करेंगे । हमारे पिताजी ने हम आठ बहन-भाई को पैदा किया था । सात बहनों के बाद मुझे पैदा करने के लिए । और बाकी जिंदगी सबकी शादियाँ ही करते रहे ।

निशा ने अपने होठों पर उँगली रख ली । आदित्य मन ही मन में बुदबुदाया "बहुत मेहनती थे" । ताँगे वाले के पूँछने पर कि आपके बच्चे नज़र नहीं आते, मालूम होता है, अभी हाल-फिलहाल में ही शादी हुई है । दोनों असहज महसूस करते हुए, ख़ामोशी से वृक्षों को देखने लगे । निशा का हॉस्टल आ पहुँचा तो आदित्य ने उतरकर सामान पकड़ाया । निशा चुप सी खड़ी रही । आदित्य अपने पर्स से कार्ड निकालकर देता है "इस पर मेरा मोबाइल नंबर है" । फिर निशा सामान उठाकर चल देती है । आदित्य दूर से ताँगे में बैठा उसे भीतर जाते हुए देखता है ।

आदित्य जानता था कि निशा कभी फ़ोन नहीं करेगी । और फिर धीरे-धीरे अपने दफ्तर के काम में व्यस्त हो जाता है । पास ही रहने के लिए सरकारी आवास मिला हुआ था । कई दिन बीत गए किन्तु निशा का फ़ोन नहीं आया । आदित्य सोचता कि कहीं मेरे कारण वह परेशान न हो जाए । और उसके ख्याल को काम के तले दबा देता ।

एक रोज़ आदित्य बाज़ार में, एक रेस्टोरेंट में बैठा था । तभी वहाँ निशा का आना हुआ । आदित्य को देखकर, वह उसके पास आकर बैठ गयी ।
-"तुम यहाँ कैसे ?" आदित्य ने जानना चाहा ।
-कुछ जरूरत का सामान खरीदना था । उसी सिलसिले में आयी थी ।
-"ओह, अच्छा" निशा के पास रखे बैग को देखकर आदित्य बोला ।
-क्या लोगी ? चाय, कॉफी या ठंडा ?
-कुछ भी नहीं ।
-"अरे ऐसे कैसे, कुछ नहीं । अरे भाई जान, ज़रा दो कॉफी लाना ।" वेटर को बुलाते हुए आदित्य बोला ।
-प्रत्युतर में निशा मुस्कुराती है ।
-काफी बदल गयी हो ।
-क्यों, क्या हुआ ?
-ये साडी, ये पहनावा, जीने का तरीका ही बदल लिया तुमने ।
-निशा पुनः मुस्कुरा देती है ।

इसी बीच कॉफी आ जाती है । आदित्य बाथरूम जाने का इशारा करते हुए उठता है । निशा की नज़र उसके पीछे रह गयी उसकी डायरी पर पड़ती है । निशा को याद हो आता है कि आदित्य को डायरी लिखने की आदत है । वो एकाएक ही डायरी को उठा, कोई पन्ना खोलती है । और पढने लग जाती है....

उस रोज़ जब ट्रेन प्लेटफोर्म पर आने को थी और तुम्हारी पलकें गीली होने को, तब मैं उसके छूट जाने की दुआ कर रहा था । तुम्हारे हाथों को थामे, ठहर जाने को मन कर रहा था । मगर अब ये मुमकिन नहीं कि तुम्हें मालूम हो कि उस रोज़ मैं वहीं छूट गया था । उसी बैंच पर, तुम्हारे आँसुओं में भीगा, अंतिम स्पर्श से गर्माता । और हर बार ही उस प्लेटफोर्म पर से गुजरते हुए, मैंने उसको वहीं पाया है । यूँ कि तुम आओगी और कहोगी 'अरे तुम अभी यहीं हो' ।

कई दफा खुद को टटोलता हूँ और जिस्म के लिहाफ़ को झाड कर फिर से जीने के काबिल बना लेता हूँ । मुई रूह के बगैर कब तलक कोई जिए जाएगा । सुनो, कभी जो गुजरों उधर से तो एक दफा उसको अलविदा कह देना । जैसे रूठे बच्चे को मनाता है कोई । शायद आखिरी की ट्रेन से मुझे आकर मिले कभी ।

कई बरस बीते हैं, साथ जिए बगैर । कुछ तो मैं भी जीने का सलीका सीखूँ । चन्द ज़ाम से गुजर सकती हैं रातें, मगर बीते बरस नहीं गुजरते । हर शाम ही तो आकर खड़े होते हैं ड्योढ़ी पर । हर सुबह ही तो छोड़ जाते हैं तनहा । हर दफा पी जाता हूँ वो पीले पन्ने, जिन पर लिखी थीं तुम्हारे नाम की नज्में ।

दोस्त नहीं देते अब तुम्हारे नाम की कस्में । हर रोज़ ही भूल जाते हैं और भी ज्यादा, कि कभी तुम भी थीं उनका हिस्सा । अब नहीं करते फरमाइश, उस किसी बीते दिन की । चुप ही आकर सुना जाते हैं, जाम में उलझा कर कई किस्से । यूँ कि सुनाया करते हों किसी महफ़िल में मुझे लतीफे की तरह ।

जानता हूँ हक़ यादों की पोटली में मृत होगा कहीं । और मैं उसमें जान फूँकने की बेवजह कोशिश नहीं करूँगा । मगर फिर भी प्लेटफोर्म की उस बैंच पर से गुजरते हुए, कभी तुम सुनना उसको । जो हर दफा कहता है मुझसे 'काश उसने मेरा हाथ थामा होता ।'

और अंत तक आते-आते निशा की आँखें गीली हो जाती हैं । जिसके चिन्ह वह आदित्य के आने से पहले ही रुमाल से हटा देती है । और उसकी डायरी यथास्थान रख देती है ।

आदित्य की वापसी के कुछ क्षण बाद, निशा जाने के लिए कहती है । आदित्य उसे साथ चलने के लिए कहता है किन्तु निशा कुछ अन्य सामान को खरीदने का कह कर टाल जाती है । फिर जब-तब ऐसा ही होने लगा । वे एक-दूसरे से टकरा जाते थे । निशा स्वंय को अतीत और वर्तमान के द्वन्द में पाती । बीते तीन बरस उसके लिए आसान नहीं थे । वह अब किसी और दुःख का कारण नहीं बनना चाहती थी । किन्तु साथ ही साथ वे पुनः एक दूसरे की आदत बनते जा रहे थे । बीते दिनों का सूखा वृक्ष पुनः हरा-भरा होने लगा था ।

फिर एक रोज़ आदित्य ने निशा को पहाड़ी पर भ्रमण के लिए आमंत्रित किया । जिसे निशा ने सहर्ष स्वीकार कर लिया था । यद्यपि उसे स्वंय के जाने और न जाने के मध्य संशय था । किन्तु अस्वीकार न करने के पीछे नया लगाव ही था । आदित्य से विदा लेते हुए, निशा ने आने का कह दिया ।

पहाड़ी के शिखर पर दोनों बीते कई क्षणों से खामोश बैठे हुए थे । गालों को थपथपा कर चली जाती, नर्म हवा बह रही थी । मौसम का मिजाज़ आशिक़ाना हो चला था । दोनों अपनी स्मृतियों से एक ही दिन, एक ही स्थान पर पहुँच जाते हैं । जहाँ निशा आदित्य के कंधे पर सर रख कर, उसकी बेहिसाब गुदगुदाने वाली बातें सुन रही थी । और आदित्य उसके हवा से बिखरते हुए बालों को, अपनी उँगलियों से कानों के पीछे धकेल देता था । और अपनी ही किसी बात पर झगड़ते हुए निशा उठ कर चल देती थी । तब पीछे-पीछे आदित्य उसे मनाने को दौड़ता था ।

एकाएक निशा वर्तमान में दाखिल होती है । और आदित्य को देखते हुए कहती है "आप शादी क्यों नहीं कर लेते । कब तक यूँ ही भटकते रहोगे । कब तक माँ प्रतीक्षा की घडी को देखती रहेंगीं । अतीत के सहारे जीवन नहीं कटता । मैं चाहती हूँ कि आप खुश रहो ।" आदित्य हाथों की लकीरों को देखता है और कहता है "सब किस्मत की बातें हैं । सुख खोज़ने से कहाँ मिलता है ? तुम भी तो खुश नहीं रह सकीं । इसीलिए शायद मेरी किस्मत में भी सुख नहीं ।" आदित्य को सुनते-सुनते निशा की आँखें गीली हो चली थीं । निशा की आँखों में झाँकते हुए आदित्य सिगरेट जला लेता है ।

बादल एकाएक मेहरबान हो गए थे । निशा स्वंय को बचाने के लिए उठ कर चल दी थी । आदित्य पीछे से निशा का हाथ पकड़ लेता है । और अपने पास खींच लेता है । इतने पास कि उनके मध्य कोई फासला नहीं बचा था । आदित्य उसकी आँखों में डूबते हुए कहता है "मुझसे शादी करोगी ।" निशा एकाएक स्वंय को आदित्य की गिरफ्त से मुक्त करते हुए कहती है "नहीं, मैं जानती थी कि आप यूँ ही मुझसे मिलते रहोगे और एक दिन मुझ पर यह एहसान करोगे ।" इसके बाद निशा वहाँ से चली जाती है और आदित्य उसे रोक नहीं सका ।

कई दिन बीत चुके थे और उन दिनों में आदित्य की निशा से कोई मुलाकात नहीं हुई थी । आदित्य की व्यग्रता बढ़ने लगी थी । फिर एक रोज़ जब वह बाज़ार से गुज़र रहा था तभी ताँगे वाले ने टोकते हुए बताया कि मैडम अस्पताल में भर्ती हैं । वह अभी-अभी उन्हें वहाँ छोड़ कर आ रहा है । आदित्य उसके साथ अस्पताल पहुँचता है । जहाँ निशा एक कमरे में लेटी हुई थी । पास ही साथ की एक अध्यापिका बैठी थी । आदित्य चुप से जाकर उसके पास बैठ जाता है । उसकी हालत देख कर आदित्य का रो लेने का मन करता है, किन्तु स्वंय को संभालता हुआ, उसके हाथों को अपने हाथों में लेकर बैठा रहता है ।

साथ की अध्यापिका बताती है कि पीलिया की शिकायत है । और पिछले दिनों से ठीक से सोयी भी नहीं है । जब ज्यादा तबियत ख़राब होती दिखी तो मैं यहाँ ले आयी । अगले एक-दो घंटे वे दोनों बातें करते रहे । फिर आदित्य ने उसे चले जाने के लिए कहा । हालाँकि उसने कई बार रुकने के लिए कहा किन्तु आदित्य ने उसे अगली सुबह आने का कह, वापस भेज दिया ।

कुछ घंटे बाद निशा नींद से जागती है और आदित्य को अपने सामने पाती है । बस खामोश एकटक उसे देखती रहती है । आदित्य गुस्सा जताते हुए कहता है "तुमने इस काबिल भी नहीं समझा कि मुझे अपनी बीमारी के बारे में बता सको ।" निशा कुछ कहने का प्रयत्न करती है "वो मैं...." । "हाँ बस कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है । मैं सब समझता हूँ ।" कहता हुआ आदित्य उसे चुप कर देता है ।

अगले चार रोज़ आदित्य अस्पताल में ही बना रहता है । निशा की दवा, खाना-पीना और जरुरत के हर सामान की फिक्र थी उसे । वह बीते दिनों में ठीक से सोया भी नहीं था । धीरे-धीरे निशा स्वस्थ हो चली थी । और निशा को सब दिख रहा था । पिछले दिनों से निशा इसी उधेड़बुन में थी । कितनी गलत थी वह आदित्य को लेकर । अपनी ही बात पर उसे पछतावा हो रहा था । कितना चाहता है आदित्य उसे । असल में आदित्य से ज्यादा कभी किसी ने उसे चाहा ही नहीं । वो अपनी ही कही हुई बात पर शर्मिंदा हो रही थी ।

एक रोज़ जब आदित्य निशा के साथ की अध्यापिका को अस्पताल में छोड़कर, कपडे बदलने के उद्देश्य से अपने कमरे पर गया था । उसके पीछे दफ्तर का चपरासी अस्पताल में निशा के पास, आदित्य के घर से आयी हुई चिट्ठी छोड़ जाता है । जिसमें माँ ने आदित्य का किया हुआ वादा याद दिलाया था । जिसे वह अंतिम बार माँ से करके आया था । उन्होंने एक लड़की देख ली थी और आदित्य से उसे देखने की सिफारिश की थी । निशा चिट्ठी पढ़कर रख देती है । फिर निशा के मस्तिष्क में विचारों का युद्ध छिड़ जाता है । वह क्यों आदित्य के रास्ते की रूकावट बने । उसे भी नए सिरे से जिंदगी जीने का हक़ है । क्यों वो दुनिया को कुछ कहने का अवसर दे । और उसने निर्णय लिया कि वह यहाँ से चली जायेगी ।

शाम को जब आदित्य अस्पताल पहुँचा तो वहाँ निशा नहीं मिली । पता करने पर मालूम हुआ कि उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गयी है । वह वहाँ से निकल कर सीधा उसके हॉस्टल पहुँचा । जहाँ निशा के साथ की अध्यापिका ने उसे केवल वह चिट्ठी पकडाई । और बताया कि निशा अभी कुछ देर पहले यहाँ से स्टेशन चली गयी है । आदित्य के पूँछने पर "स्टेशन, लेकिन क्यों ?" उसने यही उत्तर दिया कि "ज्यादा कुछ बता कर नहीं गयी । केवल इतना कह कर गयी है कि, घर जा रही हूँ ।" आदित्य चिट्ठी पढ़ लेने के बाद स्टेशन की ओर चल देता है ।

सूरज को बहुत पीछे धकेल कर, रात निकल आयी थी । जब आदित्य स्टेशन पर पहुँचा तो वहाँ कोई नज़र नहीं आया । आदित्य ने अपनी नज़रें इधर-उधर दौडायीं । दूर के दुबके कोने में निशा गुमसुम बैठी दिखाई दी । आदित्य उसके पास पहुँचता है । और चिट्ठी को उसकी ओर फैक कर बोलता है "इसके लिए जा रही थी तुम" । निशा उठ खड़ी होती है "वो आदित्य मैं...." । आदित्य निशा के गाल पर एक तमाचा मारता है "हर निर्णय को लेने का अधिकार केवल तुम्हें नहीं, समझीं" । निशा रोते हुए आदित्य के गले से लग जाती है और कहती है "मुझे माफ़ कर दो आदि, मैं न जाने क्या सोचने लग गयी थी ।"

पिछले कई क्षणों से वे यूँ ही एक दूजे से चिपके हुए थे । आने वाली ट्रेन प्लेटफॉर्म पर से शोर करती हुई चली जा रही थी । चाँद जवान हो चला था । तब उस खामोश फैली हुई चाँदनी में कुछ ओंठ तितली के पंखों की तरह खुले और बंद हुए थे । दूर बैठा चिड़ियों का जोड़ा यह देख लजा गया था । सुखद क्षणों का वह संसार, एक अध्याय बन जिंदगी से जुड़ गया...

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